भाव तुम्हारे तुम्हें समर्पित, अंतर्मन के धारे हैं, गीतों में भरकर जो आये मन के वेद उचारे हैं||
Thursday, June 16, 2011
प्रेम ....
..
...
ज़िंदगी
क्या है कभी
किसको
समझ आया यहाँ,
एक तुम्ही
थे बस तुम्ही थे
पर ना जाने थे कहाँ,
बिन तुम्हारे
दीप सा तन
बुझ के माटी हो गया,
फिर भी
दीपक सा चहकता
मन रहा केवल वहाँ ||
गीता पंडित
Thursday, June 9, 2011
Thursday, May 26, 2011
कौन कहाँ अपना होगा ...
"जीवन ही जब सपना है तो, सपना तो सपना होगा ,
कौन घाट पर उतरेगा अब, कौन कहाँ अपना होगा ,
सबकी ढपली अपनी - अपनी राग सभी के हैं अपने ,
फिर भी इस जीवन की ख़ातिर साँसों को जपना होगा||"
.गीता पंडित.
Friday, May 20, 2011
शब्द - दीप
....
.....
शब्द क्या ये दीप हैं जो रैन में हमने जलाये.
देख पूनम के निखर के बैन सारे फिर से आये
खिल गयी है चांदनी, तारे फिर से मुस्कराये,
भोर की देकर दुहाई साथ मेरे फिर से गाये | |
..गीता पंडित..
.....
शब्द क्या ये दीप हैं जो रैन में हमने जलाये.
देख पूनम के निखर के बैन सारे फिर से आये
खिल गयी है चांदनी, तारे फिर से मुस्कराये,
भोर की देकर दुहाई साथ मेरे फिर से गाये | |
..गीता पंडित..
Sunday, May 8, 2011
Friday, May 6, 2011
" माँ " ....
...
....
नाम
तुम्हारा आते ही माँ !
मन में बदली छा जाती है |
नेह पत्र पर
लिखे जो तुमने
भाव अभी हैं आज अनूठे
बेल लगी है
संस्कार की
सजा रही जो मन पर बूटे,
बूटे -
बूटे नेह तुम्हारा
मन की छजली भा जाती है |
देह कहीं भी
रहे मगर माँ
मन तो पास तुम्हारे रहता
शैशव में जो
रूई धुनी थी
कात उसे संग-संग में बहता
शब्दों
में आकर हौले से
मन की सजली गा जाती है |
गीता पंडित
....
नाम
तुम्हारा आते ही माँ !
मन में बदली छा जाती है |
नेह पत्र पर
लिखे जो तुमने
भाव अभी हैं आज अनूठे
बेल लगी है
संस्कार की
सजा रही जो मन पर बूटे,
बूटे -
बूटे नेह तुम्हारा
मन की छजली भा जाती है |
देह कहीं भी
रहे मगर माँ
मन तो पास तुम्हारे रहता
शैशव में जो
रूई धुनी थी
कात उसे संग-संग में बहता
शब्दों
में आकर हौले से
मन की सजली गा जाती है |
गीता पंडित
Wednesday, May 4, 2011
तुम्हारे बिन .....गीता पंडित
....
.....
बरसकर भी ना बरसे जो
न जाने कैसी बदली है,
नयन की कोर पर अटकी
सपन की भोर गीली है,
तुम्हारी याद का सावन
घिरा है आज फिर से क्यूँ
बना है पाखी मन फिर से,
धरा की भोर सीली हैं |
ना जाने क्यूँ नहीं आये
कहा था आऊँगा एक दिन
तुम्हारे बिन समझ लो तुम
नहीं संध्या सहेली है ,
चले आओ नहीं लगता कि
ये अब मन तुम्हारे बिन
तुम्हारे रंग से ही मीत !
मन चूनर ये पीली है | |
..गीता पंडित..
.....
बरसकर भी ना बरसे जो
न जाने कैसी बदली है,
नयन की कोर पर अटकी
सपन की भोर गीली है,
तुम्हारी याद का सावन
घिरा है आज फिर से क्यूँ
बना है पाखी मन फिर से,
धरा की भोर सीली हैं |
ना जाने क्यूँ नहीं आये
कहा था आऊँगा एक दिन
तुम्हारे बिन समझ लो तुम
नहीं संध्या सहेली है ,
चले आओ नहीं लगता कि
ये अब मन तुम्हारे बिन
तुम्हारे रंग से ही मीत !
मन चूनर ये पीली है | |
..गीता पंडित..
Sunday, May 1, 2011
यही सब ...
...
.....
हाँ !!!! तोड़ना है
छंद की रूढ़ियों को
रचना है इतिसास नया
ताकि मुक्त होकर
गा सकूं तुम्हें
निर्द्वंद, निर्पेक्षित, निरंतर
व्यूह रचा गया था
जान गया था अभिमन्यु
पर नहीं जानता था
उससे बाहर आना |
मुझे जाननी होगी
बाहर आने की कला
ताकि गढे जा सकें
नये - किले
मरम्मत की जा सके
जीर्ण - शीर्ण इमारतों की |
शब्द को देकर पहचान नयी
मैं लिख सकूं वो कविता
जो मेरे मन ने चाही
मेरी नदी से प्रस्फुटित हो
और प्रेम की भागीरथी बन
उतरे तुम्हारे मन - आकाश में ||
.. गीता पंडित ..
Thursday, April 28, 2011
सच कहती हूँ ...
....
.....
बंजर ज़मीन में
पनपेंगे
बिरवे फिर से
बस
निकालने होंगे
रोडे - पत्थर
तोड़ - तोडकर
उग आये
कांटे - कीकर
काट - छाँटकर
धरती की
सुकोमल देह को
बनाना होगा
समतल
देकर नीर
अपने मन की
सरिता का
देखना
फिर से
एक दिन
लदी होंगी डालियाँ
फूलों से
नहीं
देखना
हाथ की लकीरों को
मृग-
मरीचिका
बन भटकाएँगी
हाँ ....
सच कहती हूँ ||
.. गीता पंडित ..
Saturday, April 23, 2011
हर सुबहा के समाचार में ...गीता पंडित
नवगीत की पाठशाला २२ अप्रैल २०११ को
" समाचार " विषय पर ये नवगीत मेरा ...
.....
.......
हर सुबहा के
समाचार में
ख़बर यही बस एक रही |
कितनी हत्याएं और चोरी
कहाँ डकैती आज पडी,
बलात्कार से कितनी सड़कें
फिर से देखों आज सडीं,
मानवता रो रही अकेली
नयनों में लग गयी झड़ी,
भरे चौराहे खडी द्रोपदी
अंतर विपदा रहे खडी ,
कोर नयन की
भीगी भीगी
सुबह से ही जगी रही |
खार हुए वो प्रेम प्रेम के
खेतों की फसलें सारी,
क्यूँ अग्नि में झोंकी जाती
वो ममता मूरत प्यारी,
भाई चारा दिखे कहीं ना
एक पंक्ति भी मिले नहीं
कैसी है ये पीड़ा मन की
बन जाती नदिया खारी,
मन के बरगद
धूप पसरती
छैय्याँ मन की ठगी रही |
समाचार को हुआ है क्या
कौन किसे समझायेगा,
फिर वो ही पनघट की बातें
औ चौपालें लायेगा,
बुझे हुए हर मन के अदंर
जला आस्था की ज्योति
मुस्कानों के फूल खिलाता
हर एक द्वारे जाएगा,
मन मंदिर है
प्रेम का मीते !
बात यही मन सगी रही ||
गीता पंडित
दिल्ली ( एन सी आर )
" समाचार " विषय पर ये नवगीत मेरा ...
.....
.......
हर सुबहा के
समाचार में
ख़बर यही बस एक रही |
कितनी हत्याएं और चोरी
कहाँ डकैती आज पडी,
बलात्कार से कितनी सड़कें
फिर से देखों आज सडीं,
मानवता रो रही अकेली
नयनों में लग गयी झड़ी,
भरे चौराहे खडी द्रोपदी
अंतर विपदा रहे खडी ,
कोर नयन की
भीगी भीगी
सुबह से ही जगी रही |
खार हुए वो प्रेम प्रेम के
खेतों की फसलें सारी,
क्यूँ अग्नि में झोंकी जाती
वो ममता मूरत प्यारी,
भाई चारा दिखे कहीं ना
एक पंक्ति भी मिले नहीं
कैसी है ये पीड़ा मन की
बन जाती नदिया खारी,
मन के बरगद
धूप पसरती
छैय्याँ मन की ठगी रही |
समाचार को हुआ है क्या
कौन किसे समझायेगा,
फिर वो ही पनघट की बातें
औ चौपालें लायेगा,
बुझे हुए हर मन के अदंर
जला आस्था की ज्योति
मुस्कानों के फूल खिलाता
हर एक द्वारे जाएगा,
मन मंदिर है
प्रेम का मीते !
बात यही मन सगी रही ||
गीता पंडित
दिल्ली ( एन सी आर )
Sunday, April 17, 2011
सुर सजाकर फिर से लायें ....
सोचते क्या सुर सजाकर फिर से लायें
हम बुजुर्गों को हंसाकर फिर से लायें |
इस धुंधलके में भला क्या दिख रहा है
चल चले सूरज उठाकर फिर से लायें |
मातमी धुन है सभी कुछ बिक रहा है
चल चलें खुशियाँ सजाकर फिर से लायें |
हैं अधर चुपचाप आतुर बोलने को
चल चलें शब्दों की गागर फिर से लायें |
नयन हैं रीते बड़े बेकल से " गीता "
चल चले सपनों की चादर फिर से लायें ||
गीता पंडित
हम बुजुर्गों को हंसाकर फिर से लायें |
इस धुंधलके में भला क्या दिख रहा है
चल चले सूरज उठाकर फिर से लायें |
मातमी धुन है सभी कुछ बिक रहा है
चल चलें खुशियाँ सजाकर फिर से लायें |
हैं अधर चुपचाप आतुर बोलने को
चल चलें शब्दों की गागर फिर से लायें |
नयन हैं रीते बड़े बेकल से " गीता "
चल चले सपनों की चादर फिर से लायें ||
गीता पंडित
Wednesday, March 23, 2011
नत है मस्तक...
देकर के बलिदान तुम्ही ने, माँ का शीश उठाया है,
देश प्रेम का पाठ तुम्ही ने, हमको आज पढ़ाया है,
नमन तुम्हें ए वीर जवानों तुम सपूत भारत माँ के,
तुम्हें याद करके देखो अखियों में बादल छाया है||
... गीता पंडित...
Wednesday, November 3, 2010
आ चलें बन दीप....गीता पंडित
आ चलें बन
दीप दीवाली मनायेंगे ।
मन में ना
आये व्यथा,
लिखें उजाले
की कथा,
एक दिन तुम
देखना मन मुस्करायेंगे |
नयन जिनमें
तम भरा हो,
पग वो जिसमे
कोहरा हो,
आस की लाकर
किरण उनको सजायेंगे |
आ सहेजें
सबको आओ
सुर से सुर
अपना मिलाओ,
गुनगुना कर
एकता के गीत गायेंगे ।
नयन से आ
द्वेष झरता
नीर मन का
आ सहमता,
पीर की होली जलाकर मन रंगायेंगे ।
एक दिन तुम देखना
मन मुस्करायेंगे ||
दीप दीवाली मनायेंगे ।
मन में ना
आये व्यथा,
लिखें उजाले
की कथा,
एक दिन तुम
देखना मन मुस्करायेंगे |
नयन जिनमें
तम भरा हो,
पग वो जिसमे
कोहरा हो,
आस की लाकर
किरण उनको सजायेंगे |
आ सहेजें
सबको आओ
सुर से सुर
अपना मिलाओ,
गुनगुना कर
एकता के गीत गायेंगे ।
नयन से आ
द्वेष झरता
नीर मन का
आ सहमता,
पीर की होली जलाकर मन रंगायेंगे ।
एक दिन तुम देखना
मन मुस्करायेंगे ||
Tuesday, November 2, 2010
कुछ मन की -----
जीवन की सुंदर नगरी से
सपने कुछ चुन लेना ,
कुछ मन की कह लेना मेरे
मन की कुछ सुन लेना |
एक झुनझुना मनुज है केवल
स्वयं नहीं बज पाये,
अंतर की घाटी के उपवन
मुखरित हो कब आये,
अथक चले चलना है मीते !
मन सुहास बुन लेना |
सपने कुछ चुन लेना |
हिचकोले लेकर चलती है
पल पल की नैय्या,
फिर भी जाने कौन थामता
आकर के बैंय्या,
नेह आस्था के बंधन फिर
अंतर में गुन लेना |
सपने कुछ चुन लेना ||
गीता पंडित
Monday, March 1, 2010
ऐसी आये अब के होली...
....
.....
ऐसी आये अब के होली ॥
मन में भरे रंग की झोली,
नेह की भरभर आये टोली,
रंग प्रेम का हर एक बरसे,
बँध जाये फिर मन पर मौली ।
प्रेम भरी हो सब की बोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
तुम ने कैसे रंग लगाये,
मन पलाश से होकर आये,
ढूँढ रही फिर वही अल्पना,
जो अंतर में बनकर आये ।
चूनर पर हो वही रंगोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
नयनों में फिर झूले सपने,
बिन साजन के कैसे अपने,
फिर से आये पवन बसंती,
लगे श्वास को मन से जपने।
उपवन हो हर मन की खोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
जा बसंत !प्रिय को ले आ रे,
मधुमास मेरे अंग खिला रे,
चूनर धानी रंग के लाऊँ,
पैंजनिया को बोल पिला र ।
आ जाये फागुन की डोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
गीता पंडित (शमा)
.....
ऐसी आये अब के होली ॥
मन में भरे रंग की झोली,
नेह की भरभर आये टोली,
रंग प्रेम का हर एक बरसे,
बँध जाये फिर मन पर मौली ।
प्रेम भरी हो सब की बोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
तुम ने कैसे रंग लगाये,
मन पलाश से होकर आये,
ढूँढ रही फिर वही अल्पना,
जो अंतर में बनकर आये ।
चूनर पर हो वही रंगोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
नयनों में फिर झूले सपने,
बिन साजन के कैसे अपने,
फिर से आये पवन बसंती,
लगे श्वास को मन से जपने।
उपवन हो हर मन की खोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
जा बसंत !प्रिय को ले आ रे,
मधुमास मेरे अंग खिला रे,
चूनर धानी रंग के लाऊँ,
पैंजनिया को बोल पिला र ।
आ जाये फागुन की डोली ।
ऐसी आये अब के होली ॥
गीता पंडित (शमा)
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