Wednesday, May 29, 2019

एक ग़ज़ल -गीता पंडित

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नारों में खो गयी अदा है
जिस पर सारा देश फिदा है

कौन किसे कब समझ सका है
अपनी ही बस एक सदा है 

रातों को दिन कहने वाले
कैसी तेरी अजब अदा है

ढूंढें से भी मिले नहीं जो
रखता कैसी बता गदा है

'गीता' कहती सच्ची बातें
गीता में मन रहा सदा है || 


  

Monday, May 6, 2019

लोकतंत्र दुख पाता है - गीता पंडित


लोकतंत्र दुख पाता है -

फिर संसद ने टेर लगाई
समय खड़ा मुसकाता है

लगा सभा हर मंच दहाड़ा
सेहरा बाँधे हँसे चुनाव
झूठ पहनकर चोगा व्हाइट
सच बेचारा रहा फँसाव

बग़लें झाँके वोट यहाँ अब
लोकतंत्र दुख पाता है

हर चौराहा इशतहार बन
रोक रहा जन मन के पाँव
कुर्सी दल बल बनकर देखो
लगा रही है शकुनी दॉव

सुबहा खड़ी अपलक निहारे
दिनकर रोता आता है।
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गीता पंडित

7 मई 2019