Tuesday, July 31, 2012

अनुराग है अस्तित्व मेरा (स्त्री) ...... गीता पंडित

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प्रेम मेरा वसन है
आत्मा है राग
अनुराग है अस्तित्व मेरा
गाती रहूंगी जीवनपर्यंत

तोडती रहें परिस्थितियाँ
नहीं डिगा पाएंगी पथ से
आयरन खाकर हो गयी हूँ आयरन
चेरी हूँ विरह की

लिखती है मेरी लेखनी व्यथा
जो टपकती है तुम्हारी पलकों से
मेरी आँख में
व्यथा जो करती है नर्तन
धुरी पर प्रेम की

प्रेम जो अनश्वर है
अनादि है
हो गया है ओझल 
हमारी आँख से 
या 
हो गये हैं गांधारी हम ही 
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गीता पंडित 

1 अगस्त / 12 

Wednesday, July 25, 2012

हक़दार हैं भई पुरस्कार के (एक व्यंग्य) .... गीता पंडित

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मनाया जायेगा जश्न
टकराएंगे जाम से जाम
माँ उतारेगी आरती अपने सपूतों की
बहन लेगी बलाएँ
और करेगी प्रार्थना भाईयों की लंबी उम्र के लियें
उन के द्वारा किये गये कारनामों के लियें
रोशन करके आये हैं जो पिता का नाम,
गली मौहल्ले, समाज देश का नाम


कारनामा भी इतना बड़ा
जिसे सुनकर सिहर उठेगी हवा
सहम जायेगी बहती सरिता
दहल जाएगा धरती का दिल-ओ दिमाग


रेप किया चौहत्तर वर्ष की महिला का
बलात्कार किया ढाई साल की मासूम बच्ची का
मारा पीटा, नोचा खसोटा
निर्वस्त्र किया सडक पर जाती अकेली लड़की को


लंबी है कारनामों की फेहरिस्त
इनाम तो मिलना ही चाहिए
दे दीजिये आप जो चाहें 
हक़दार हैं भई पुरस्कार के 



गीता पंडित 
25/7/12