Tuesday, January 31, 2012

आभारी हूँ तुलसी नीलकंठ जी की और संपादक जी की.....समीक्षा ...... तुलसी नीलकंठ द्वारा .."सत्यचक्र समाचार पत्र में


पुस्तक बच्चे की तरह प्रिय होती है क्यूंकि यह भी प्रसव पीड़ा के बाद ही जन्म लेती है ...

इसलियें किसी का कोई भी कथन विशेष अर्थ के साथ सामने आता है |


___मन तुम हरी दूब रहना __  मेरे काव्य संग्रह पर तुलसी नीलकंठ जी ने समीक्षा की है ... 

हृदय से आभारी हूँ तुलसी नीलकंठ जी की और संपादक जी की...


सत्यचक्र साप्ताहिक समाचार पत्र में य ह समीक्षा छपी है 16 से 22 ता...जनवरी  12 ..

Friday, January 27, 2012

आज मुझे "मा" गाओ ....... गीता पंडित

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मेरे मन के प्रांगण में भी
भाव सुमन भर लाओ,
मैं नित-नित गाती हूँ तुमको
आज मुझे माँ ! गाओ 
 
शंख नाद के पावन भावों 
सी भर आये मेरी लेखनी,
सत्यं शिवं सुंदरं बनकर
जनमन कथा सुनाये लेखनी,

वीणा पाणी मात शारदे !
ऐसा वर ले आओ |
मैं नित-नित गाती हूँ तुमको
आज मुझे  माँ ! गाओ |

लिखी सूर की तुमने पाती
बनीं कबीर की भाषा सादी,
बाँची तुलसी की रामायण
कालीदास को आयीं गाती ,

रुद्ध कण्ठ है अधर हैं कंपित
सुर सरिता लहराओ  |
मैं नित-नित गाती हूँ तुमको
आज मुझे माँ ! गाओ |

तुमको गाती आयी युगों से
कब गाने मैं पायी.
तुम ही मात्रा अक्षर बिंदु 
कब वर्ण समझ मैं पायी,  

बरसें नयना हर पल मेरे 
गीतों में ढल आओ ।
मैं नित-नित गाती हूँ तुमको
आज मुझे माँ ! गाओ ||


गीता पंडित 

(मन तुम हरी दूब रहना ) मेरे काव्य संग्रह से 

Saturday, January 14, 2012

मेरे कुछ मुक्तक कुछ शेर .... गीता पंडित

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था दिया बनवास मैंने खुद ही अपनी कामना को

आज फिर से भावना के द्वार पर इकली खड़ी हूँ

क्या पता है मेरा मुझको जानना बेहद ज़रूरी


अपने मन की चौखटों से आज फिर इकली लड़ी हूँ || 

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पीर भरी मैं पाती कोई 


गीत प्रेम के गाती हूँ 


हरेक मन की पीड़ा गाकर 


पीड़ा में मुस्काती हूँ  |
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देह केवल मात्र रह गयी, जबकि कब वो देह थी


मन की शाला देखी किसने वो तो केवल मेह थी |
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पूजन की थाली को शब्दों 


का अर्चन भा जाता है 


गीतकार जब कोई छन्दों 


में जीवन गा जाता है |
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सुना था कल शहर में, गश्त पर थी बर्फ बारी 

कौन वो घुटने समेटे सुबह को था चल बसा  |









चलो हम नेह की नदियाँ कहीं से फिर बहा लाएँ 


सुना है आज सूखे से हर एक बस्ती विरानी है | 
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तुम भी सही थे मैं भी सही , कुछ तो था जो सही नहीं था 

देख लकीरें सोच रही हूँ, मिलना क्यूँ कर बदा नहीं था ...

अंग - अंग पर देख बन गयी है फुलकारी अब क्या सोचें 

नाम तुम्हारा मन पुस्तक से अब भी क्यूँकर कटा नहीं था |



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गीता पंडित 


( फेसबुक पर भी हैं ये मेरे स्टेटस पर )

Friday, January 6, 2012

मन जब जब यूँ ही कुछ कहता .... गीता पंडित

कुछ यूँ ही मेरी लेखनी से __







कहीं से हम बहा लाएँ चलो फिर नेह की नदियाँ
सुना है आज सूखे से हरेक बस्ती विरानी है | 

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तुम भी सही थे मैं भी सही , कुछ तो था जो सही नहीं था 

देख लकीरें सोच रही हूँ, मिलना क्यूँ कर बदा नहीं था ...

अंग - अंग पर देख बन गयी है फुलकारी अब क्या सोचें 

नाम तुम्हारा मन पुस्तक से अब भी क्यूँकर कटा नहीं था ...

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आपकी पायल के घुँघरू सुन ना पाये हम कभी 

है प्रतीक्षा मेरे घर पर तुम कभी तो आओगी 

झीनी सी इस चूनरी को, है सम्भाला यत्न से 

एक दिन मैं कहती तुमसे साथ तुम भी गाओगी |

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उम्रभर लिखता रहा जो खत वो वापस आ गये

ज़िंदगी ! तेरा पता बदला था कब अनजान हूँ

मैं यही था मैं यहीं हूँ, पर ना जाने क्या हुआ

जिंदगी ! तेरे ही घर में, आज मैं महमान हूँ | |

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जीवन क़ागज़ की एक पुड़िया
उस पुड़िया में प्रेम भरे कण
वही हरेक जन को मिल जायें
बोल और क्या चाहे रे मन ! 

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ओस की बूँदें पड़ीं जो धरती के तपते तवे पर
धूआँ ऐसा फैला देखो, हर दिशा कुहरा गयी ...










कभी-कभी पीड़ा की पायल ऐसे सुर में बज उठती है
सारे स्वर मध्यम हो जाते एक अकेला स्वर है भाता
मीरा के एकतारे पर तब गुनगुन करके मनवा गाता
कौन सुनहरी चादर ओढ़े मन को आकर है सहलाता |

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"रख देना दो शब्द अगर अधर मूक हो जाएँ तो, 

हर मन के द्वारे जाकर सुमन एक तो रख देना " .




गीता  पंडित

 ( ये मेरे फेसबुक पर भी स्टेटस हैं....)