Thursday, June 16, 2011

प्रेम ....


..
...


ज़िंदगी
क्या है कभी
किसको
समझ आया यहाँ,


एक तुम्ही
थे बस तुम्ही थे
पर ना जाने थे कहाँ,


बिन तुम्हारे
दीप सा तन
बुझ के माटी हो गया,


फिर भी
दीपक सा चहकता
मन रहा केवल वहाँ ||



गीता पंडित

Thursday, June 9, 2011

तुम थे रंग , कैनवस कूची

वो सब सजे हुए ऐसे ही,

जब भी रंग भरुंगी तुम ही

रंग बनकर के आ जाओगे ,

चित्र-चित्र में आकर तुम ही

रंग बनकर के मुस्काओगे |



..नमन हुसैन साहब को ..

,, गीता पंडित..