Tuesday, November 2, 2010

कुछ मन की -----





जीवन की सुंदर नगरी से
सपने कुछ चुन लेना ,
कुछ मन की कह लेना मेरे
मन की कुछ सुन लेना |


एक झुनझुना मनुज है केवल
स्वयं नहीं बज पाये,
अंतर की घाटी के उपवन
मुखरित हो कब आये,


अथक चले चलना है मीते !
मन सुहास बुन लेना |
सपने कुछ चुन लेना |


हिचकोले लेकर चलती है
पल पल की नैय्या,
फिर भी जाने कौन थामता
आकर के बैंय्या,


नेह आस्था के बंधन फिर
अंतर में गुन लेना |
सपने कुछ चुन लेना ||


गीता पंडित

1 comment:

राकेश कौशिक said...

बहुत सुंदर गीत

विशेष
"एक झुनझुना मनुज है केवल
स्वयं नहीं बज पाये,
अंतर की घाटी के उपवन
मुखरित हो कब आये,

अथक चले चलना है मीते !
मन सुहास बुन लेना"