Sunday, May 8, 2011

तुमसे से ही तो जाना मैंने
है विस्तार कहाँ तक मेरा
एक तुम्हारे कारण मन में
नेह ने डाला अपना डेरा ||
तुमसे अब पहचान है मेरी,
" माँ: कहकर तुम मुझे बुलाते
अंग - अंग में एक तुम्ही से
फूट नेह के चश्मे आते | |




संसार की सबसे भाग्यशाली
" तुम्हारी माँ "
गीता पंडित

8 comments:

गीता पंडित said...

Thanks my son ...


Now I am a complete women
because you call me "MOM"


मुझे तुम्हारी मम्मा होने पर गर्व है विभोर...


GOD BLESS YOU...
Have faith in you ...you will be what you wish to be.


love you my baby..
YOUR,S MOM

ओम पुरोहित'कागद' said...

वाह गीता जी !
बहुत खूब अभिव्यक्ति !
जय हो !
ब्लोग भी बहुत सुन्दर-बधाई हो !
www.omkagad.blogspot.com

गीता पंडित said...

आभार ..ओम पुरोहित जी ...


शुभ कामनाएं..
गीता पंडित

गीता पंडित said...

"मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार |"

निदा फ़ाज़ली

जयकृष्ण राय तुषार said...

माँ के सन्दर्भों से जुड़ी एक उत्कृष्ट कविता बधाई गीता जी |

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर ...माँ की ममता से बढ़कर क्या है संसार में...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर!
आप बहुत भावप्रणव रचना लिखतीं हैं!

गीता पंडित said...

भावना के बिन कोई रिश्ता ना चलने पायेगा,
प्रेम के बिन मीत मेरे ! प्राण कैसे गायेगा |

आभार शास्त्री जी...

सादर
गीता पंडित