भाव तुम्हारे तुम्हें समर्पित, अंतर्मन के धारे हैं, गीतों में भरकर जो आये मन के वेद उचारे हैं||
Saturday, November 5, 2011
बोन्ज़ाई.........गीता पंडित
क्या ना जाने आज पथ में
खो रहा है |
क्यूँ नहीं पल की कथा का
आज तक हिस्सा बने ,
नेह के बीने थे कण-कण
क्यूँ नहीं किस्सा बने ,
मन का बरगद बोन्ज़ाई
हो रहा है,
क्या ना जाने आज पथ में
खो रहा है ||
गीता पंडित
(मेरे नवगीत के अंश)
Friday, October 28, 2011
एक पीड़ा थी तुम्हारी ... गीता पंडित ,
...
...
एक पीड़ा
थी तुम्हारी ,
और
संग तन्हाईयाँ थी,
उम्र की
नैया में अब तो
नीर
भर-भर आ रहा है
मैं ना
भूली हूँ तुम्हें ,
और ना भूलुंगी कभी पर
याद का
पाखी ये देखो ,
आज झर-झर आ रहा है ||
गीता पंडित
( भाई दूज पर विशेष तुम्हारे लियें )
Tuesday, October 25, 2011
ड्योढी - ड्योढी दीप जलें.... गीता पंडित
...
...
ड्योढी - ड्योढी
दीप जलें
घर-घर हो उजयारी,
मेरे दीपक
ज्योति जलाओ
अंतर्मन में न्यारी |
आज महल के
संग-संग देखो
कुटिया में भी दीप जलें,
मन की लहरी
आये झूमती
सबके मन में गीत चलें,
आज ना भीगें
नयन किसी के
नेह सुधा सब पर वारी |
(अंश मेरे नवगीत के )
गीता पंडित
...
ड्योढी - ड्योढी
दीप जलें
घर-घर हो उजयारी,
मेरे दीपक
ज्योति जलाओ
अंतर्मन में न्यारी |
आज महल के
संग-संग देखो
कुटिया में भी दीप जलें,
मन की लहरी
आये झूमती
सबके मन में गीत चलें,
आज ना भीगें
नयन किसी के
नेह सुधा सब पर वारी |
(अंश मेरे नवगीत के )
गीता पंडित
Sunday, October 23, 2011
नवगीत की पाठशाला: २७. उत्सव के ये मौसम
नवगीत की पाठशाला: २७. उत्सव के ये मौसम: उत्सव के ये मौसम क्या क्या रंग दिखाते आये, तन-मन यादों के मेले में फिर भरमाते आए लाल ओढनी ओढ़े मनवा फिर से हुआ मलंग, अंतर्मन की ड्योढ़ी...
Friday, October 21, 2011
किसी के लियें नहीं वांछनीय ... गीता पंडित
...
....
देख सकती हूँ भूखा स्वयम को
क्या देख पाउंगी भूख से दम तोड़ते हुए तुम्हें
भूखे भेडिये बैठे हैं निशाने साधे
और मैं फटे चीथड़ों में तन को ढांपती
कभी देखती हूँ तुम्हें,
कभी अपने आप को,
कभी कौने में ओंधे मुंह बेहोश पड़े नर पिशाच को
और कभी मंदिर में सजे उस भगवान को
पूंछती हुई कि कहो मेरा दोष, मेरा पाप
क्यूँ है मेरा ऐसा वर्त्तमान
क्यूँ था मेरा बेबस बीता हुआ कल
और ऐसा ही होगा मेरा तुम्हारा आने वाला कल
निरपराध होते हुए भी
मेरा जन्म केवल अपराध भरा
उस पर तुम्हारा जन्म
उससे भी बड़ा अपराध
हाय !!!!!
कैसी हतभागिनी मैं
और तुम
किसी के लियें नहीं वांछनीय
क्यूँ ??
.... गीता पंडित
....
देख सकती हूँ भूखा स्वयम को
क्या देख पाउंगी भूख से दम तोड़ते हुए तुम्हें
भूखे भेडिये बैठे हैं निशाने साधे
और मैं फटे चीथड़ों में तन को ढांपती
कभी देखती हूँ तुम्हें,
कभी अपने आप को,
कभी कौने में ओंधे मुंह बेहोश पड़े नर पिशाच को
और कभी मंदिर में सजे उस भगवान को
पूंछती हुई कि कहो मेरा दोष, मेरा पाप
क्यूँ है मेरा ऐसा वर्त्तमान
क्यूँ था मेरा बेबस बीता हुआ कल
और ऐसा ही होगा मेरा तुम्हारा आने वाला कल
निरपराध होते हुए भी
मेरा जन्म केवल अपराध भरा
उस पर तुम्हारा जन्म
उससे भी बड़ा अपराध
हाय !!!!!
कैसी हतभागिनी मैं
और तुम
किसी के लियें नहीं वांछनीय
क्यूँ ??
.... गीता पंडित
Saturday, October 15, 2011
एक तुम्हारे लियें...... गीता पंडित ..
..
...
वो रही यूँ ही मचलती
कौन मेरे संग गाती |
शब्द वो मुझसे चुराती,
भाव सारे बीन लाती
चाँद के ठंडे तवे पर
सेक रोटी दीन पाती,
चांदनी से छीनकर वो
चांदनी को गुनगुनाती
रैन के सारे तमस को
पी के सुबह मुस्कराती
कौन मेरे संग गाती ||
....
सुर सजें
कुछ इस तरह
बस
तू ही तू एक साथ हो,
प्रेम की
हर एक गली में
मन
से मन की बात हो,
छाँव हो
और धूप हो,
पथ
साथ हों ना साथ हों,
कामना
अब तो यही ,
हाथों
में तेरा हाथ हो ||
....
तुम्हें सुनना,
तुम्हें गुनना,
तुम्हारी बात बस करना
ना जाने क्यूँ
यही बस काम
मन को आज भी भाता
.....
पवन तुम्हारी
बातें बोले
दिनकर अंखियाँ
तुमसे खोले
तुमसे ही तो
मेरे मन की
मैना
मेरे अंतर डोले
आज उडूं मैं
चिडया बनकर
तुम भी
मेरे साथ में आओ
हौले-हौले
मन सितार पर
प्रेम भरी
एक सरगम गाओ ||
....
गीता पंडित
Friday, October 7, 2011
मेरी राह देखती होगी... गीता पंडित
...
....
कहीं सुहानी सुबह एक तो ,मेरी राह देखती होगी
इसीलियें तो पल के पन्नों, पर लिख लायी प्रीत नयी,
तुम भी गाओ मेरे संग में जलतरंग मन के बज उठें
धरती क्या फिर अम्बर पर भी दिख पायेगी प्रीत नयी||
गीता पंडित
Thursday, October 6, 2011
स्त्री ...गीता पंडित
स्त्री ____
बचपन से ही जान गयी थी
प्रेम था केवल सपना ,
मेरे मन का हिस्सा ही तो
था केवल मेरा अपना ,
लेकिन वो भी छूट रहा था
व्यथित हुई मैं उस पल तो,
फिर भी शेष कहीं पर रखा
मैंने अंतर के जल को ||
गीता पंडित
वरना ये एक धोखा है ...गीता पंडित
...
....
कभी जलाने
से पहले
रावण को
हमने सोचा है,
कितने रावण
मन के अंदर
जिनको हर पल भोगा है,
दूर करें
हर एक बुराई,
पहले
अपने मन - तन की ,
तभी तो
सच्चा
जलना होगा
वरना ये तो धोखा है
गीता पंडित
....
कभी जलाने
से पहले
रावण को
हमने सोचा है,
कितने रावण
मन के अंदर
जिनको हर पल भोगा है,
दूर करें
हर एक बुराई,
पहले
अपने मन - तन की ,
तभी तो
सच्चा
जलना होगा
वरना ये तो धोखा है
गीता पंडित
Wednesday, October 5, 2011
विजय-दशमी की बधाईयाँ ... गीता पंडित
..
...
कभी - कभी
जीवन के
पथ में
एसे मोड भी आते हैं,
सब कुछ
अच्छा
होता है पर
पथ,
पथ में खो जाते हैं
आशा की
नगरी में फिर भी
मन के पाखी भटकें ना
इसीलियें
हम
विजय दिवस पर
आस बीज बो जाते है"
विजय-दशमी के पावन पर्व पर सभी के मन प्रफुल्लित हों...
.दशहरे की हार्दिक बधाई स्वीकार करें.............. गीता पंडित
.... गीता पंडित
Monday, September 19, 2011
स्त्री.... गीता पंडित
....
.....
बेबस क्यूँ बेजान हूँ मैं,
अब कह दो इंसान हूँ मैं |
बाहर - बाहर पिघली हूँ
अंदर से चट्टान हूँ मैं |
अंदर भीड़ बड़ी भारी ,
बाहर से सुनसान हूँ मैं |
बाहर है संग्राम बड़ा
अंदर एक पहचान हूँ मैं |
मेरे जुलाहे! कात मुझे
रूई धागा शमशान हूँ मैं |
.गीता पंडित ,
.....
बेबस क्यूँ बेजान हूँ मैं,
अब कह दो इंसान हूँ मैं |
बाहर - बाहर पिघली हूँ
अंदर से चट्टान हूँ मैं |
अंदर भीड़ बड़ी भारी ,
बाहर से सुनसान हूँ मैं |
बाहर है संग्राम बड़ा
अंदर एक पहचान हूँ मैं |
मेरे जुलाहे! कात मुझे
रूई धागा शमशान हूँ मैं |
.गीता पंडित ,
Thursday, September 8, 2011
एक गज़ल ........ गीता पंडित
...
....
सुबह से साँझ तक खपकर हम इतना कमाते हैं
मिले दो जून की रोटी, इक सपना सजाते हैं |
उमर की शाख पे देखो , ये बरगद पुराना है
कहें किससे बिना छत के हम सोने न पाते हैं |
घने जंगल उगे कीकर, लहु रिसता है श्वासों से
जहाँ भी चाह मिलती घर वो अपना बनाते हैं |
कहाँ है रुक्मणी बोलो घर जिसने सजाया है
समर्पण की विधा भूले , राधा कृष्ण गाते हैं |
मुखौटे ओढ़कर जीना 'गीता' कब हमें आया
जिसे भी हम बुलाते हैं, दिल से ही बुलाते हैं |
.... गीता पंडित..
Friday, September 2, 2011
धुंधाती अंखियों में देखो ...गीता पंडित ( एक नवगीत )
..
....
चट्टानी
प्राचीरों पर भी
नव-चित्रों की
कथा सुनाये |
किरण-किरण
फैले उजियारा
मन ये भोर सुनहरी पाये |
समय थपेड़े
मारे चलता
कोई उसको कुछ समझाये,
श्रम की रोटी
खाने वाले
कैसे भूखे मरते आये,
लिखने को लिख
गये ग्रंथ हैं
आँसू अब भी आँखों में हैं,
कितने भी
जुलूस निकालो,
दर्द कमल की पाँखों में है,
मैं भी बोलूँ
तुम भी बोलो
पीड़ा मन की छँटकर आये |
यौवन अल्हड
भरी जवानी
अंग-अंग एक गीत बना है,
लेकिन ये क्या
फटे - चीथड़े
हर चौराहा रक्त सना है,
नेह जले है
रातों - रातों
जीवन की रचना भी खोई,
धुंधाती
अंखियों में देखो,
पनप रहा है सपना कोई,
चुपके से ये
रात रुपहली
वेष बदलकर दिनकर लाये |
चट्टानी
प्राचीरों पर भी
नव-चित्रों की कथा सुनाये |
गीता पंडित
Saturday, August 27, 2011
नये सपन की बात ... गीता पंडित
..
....
कुहराई है
टहनी - टहनी,
पात - पात
कुहरा आया
फिर भी
नव - पत्तों की बातें
देखो डाली करती है,
शब्द - शब्द में
बहकी
फिरती
भाव - भाव में
टंक आती,
नये
सपन को
देखो अब भी
आँख
मेरी तकती है |
.गीता पंडित.
लोकतंत्र की विजय गर्व है मुझे मैं
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की नागरिक हूँ
और वो देश मेरा अपना है ........... जय हिंद ...
Friday, August 5, 2011
यूँ ही कुछ मन से ......गीता पंडित
....
....
इन अंधेरों में भला क्या सोचना है अब मुझे
रोशनी हूँ रोशनी बन गुनगुनाती आऊँगी,
दीप है मेरा पता ये हाथ में मेरे लिखा है,
दीप की गाथा युगों तक ज्योति बनकर गाऊँगी|
....
मैं वो ज्योति आंधियों में
भी अकेली जो जली हूँ,
नेह के आँगन की बेटी,
पीर में लेकिन पली हूँ |
....
राम रहीम में रहे अलग क्या
सबमें वही समाया,
नेह के बंधन रहें सजीले
मन ने ये दोहराया |
....
दो शेर ( गज़ल से )..
रोक लें उम्र को के जीना है अभी,
शेष रहा जो गरल पीना है अभी |
यूँ गुज़रती जा रही इस जिंदगी के ,
हर फटे आँचल को सीना है अभी |
....
1)
ज़िंदगी में मोड तो आये कई लेकिन ना जाने
कौन सा वो मोड था कि मैं कहाँ पर रुक गया,
रात की सुनसान नगरी, चाँदनी, बेकल पवन
कह रहीं क्या जाने यूँ सर कहाँ पर झुक गया |
.....
2)
किरण की पालकी लेकर नया दिन फिर से आया है
लो जागें आज फिर से हम दिनकर मुस्कराया है,
समय की डोर से बंध कर,करें पूरा हरेक सपना,
जिसे देखा था कल हमने समय फिर आज गाया है|
.....
गीता पंडित
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