Monday, September 19, 2011

स्त्री.... गीता पंडित

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.....


बेबस क्यूँ बेजान हूँ मैं,
अब कह दो इंसान हूँ मैं |


बाहर - बाहर पिघली हूँ
अंदर से चट्टान हूँ मैं |


अंदर भीड़ बड़ी भारी ,
बाहर से सुनसान हूँ मैं |


बाहर है संग्राम बड़ा
अंदर एक पहचान हूँ मैं |


मेरे जुलाहे! कात मुझे
रूई धागा शमशान हूँ मैं |


.गीता पंडित ,



21 comments:

गीता पंडित said...

Awadhesh Kothari (फेसबुक)

Beautiful-Marmik-Bhaavpoorn.............:)))))

गीता पंडित said...

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Ratnesh Maurya

बहुत खूब

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Sarita Yadav

g8

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Ratnesh Tripathi

वाह ! बहुत सुन्दर !

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Vilas Pandit

Gita ji behad khubsoorat bayaan hai aapka..

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Vilas Pandit

aabhar nahi Gita ji aapki mehnat ka kamal hai..bahot bha gai aapki ye rachna..

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Santosh Kumar Mishra

मेरे जुलाहे! कात मुझे
रूई धागा शमशान हूँ मैं ..........Nice Geeta Jee

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Neenu Kumar

very nice....

गीता पंडित said...

phesnook.


सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी

bahut khoobsoorat...shabd.. :))

Ashish Pandey "Raj" said...

बाहर - बाहर पिघली हूँ
अंदर से चट्टान हूँ मैं...

कोमल है कमज़ोर नहीं
का अंतर्भाव समेटे सुन्दर कविता ..दी!आभार

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Kavi Arjun Alhad SUPPERRB...!!
GEETA DIDI JI..!!
फिर क्यूँ तेरे नयनो सेँ
यूँ झर झर
अश्रु बहते हैँ.!
हे नारी !
तेरी महिमा का
वर्णन तो
वेद पुराण
भी कहते है.!
धन्य तेरा
अस्तित्व जगत मेँ
हैँ धन्य !
जगत मेँ तू नारी..!
तेरे गर्भ मेँ
पोषण को उत्सुक
स्वयं सनातन
रहते हैँ..!!
॥यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता॥thanx...alhad

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Surendra Chaturvedi

कुछ ही शेर उम्दा है.बाकी भर्थी के है.

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Sanjeev Agarwal

‎"estri" Tum to jagat ki maata ho, sakti ki adhisthata ho, fir bebas na mano tum, insan ko pahchano tum. jai shiv. jai maata gouri.

गीता पंडित said...

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ....इसी अर्चन के कारण नारी का हास हुआ... एक तरफ दुर्गा,चंडी लक्ष्मी, दूसरी तरह भरे चौराहे चीर हरण..... नहीं .....अर्चन नहीं.... सहचर बनें , कदम से कदम मिलाकर चलें बस इतनी चाह ...सबल है वो अपने पथ पहचानती है आज .... Kavi Arjun Alhad, Sanjeev Agarwal, श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' .

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श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

अंदर भीड़ बड़ी भारी ,
बाहर से सुनसान हूँ मैं,

बाहर है संग्राम बड़ा
अंदर एक पहचान हूँ मैं ....अद्भुत

गीता पंडित said...

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श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

अंदर भीड़ बड़ी भारी ,
बाहर से सुनसान हूँ मैं,

बाहर है संग्राम बड़ा
अंदर एक पहचान हूँ मैं ....अद्भुत

गीता पंडित said...

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श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

अद्भुत पंक्तियां बहुत सुन्दर और प्रेरक ..

गीता पंडित said...

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Ashok Aggarwal

सोच कर कच्ची कली हमको मसलना छोड़ दो
अब हमें भी पत्थरों में छेद करना आ गया है .... with respects to all women .Aurat ki khuddari ko bade sashakt dhang se ukerti gazal. Badhai didi.

गीता पंडित said...

आपसे सहमत हूँ एक सशक्त स्त्री को ही मैंने यहाँ उकेरा है जो प्रश्न करती है कि उसे बेजान ना समझा जाये जो अंदर से सख्त है, पहचानती है अपने आपको ... आभार अशोक दा.

गीता पंडित

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Suneel R Karmele

बाहर है संग्राम बड़ा
अंदर एक पहचान हूँ मैं........... उत्‍तम पंक्‍ति‍यॉं......

Vaneet Nagpal said...

गीता पंडित जी,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगसपाट डाट काम" के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|