Friday, August 8, 2008

हाय ! रह ना पाती....

मिल जाये,अंधकार को,कितनी भी आजादी,
बुझ पायेगी ना, अंतर्मन जो जलाये बाती,
डिगें ना प्रण से, कहतीं वेद - रिचाएं सारी,
ले देख देव-लोक भी,आज हिय की आचारी,


धारे देखो, निस्वार्थ - भाव से, नदी बहाती,
तरु - वर की सौगातें, नित ही हमें लुभातीं,
सूरज की थाती बिना मोल, कैसे बिक जाती,
थक जाने पर, लोरी गाने क्यूँ रजनी आती,


बदलती ॠतुएँ , गुण जीने के सिखला जातीं,
आस का बिगुल बजाकर भोर किरण मदमाती,
ओढ अम्बर की चादर, झूम कर बदली गाती,
अवनि भी बूंदों संग, ताल से ताल मिलाती,


योगी-यति,मुनि,ग्यान-वान साधक और ध्यानी,
पाते अंतर में उस को, जो है सबका मानी...,
मोह - पिपासा में खो जाती ,अंतर की वाणी.,
आसक्ति करती नर्तन,मन - उपवन में अभिमानी,


हाय ! रह ना पाती, मन की सुंदरता न्यारी,
पग-पग पर वो,अपनी ही मृग-तृष्णा से हारी,
जग मिथ्या,केवल जनम-मरण की एक निशानी,
माटी का तन, हर पल लिखे, एक नयी कहानी ||


गीता पंडित (शमा)

2 comments:

रश्मि प्रभा said...

हाय ! रह ना पाती, मन की सुंदरता न्यारी,
पग-पग पर वो,अपनी ही मृग-तृष्णा से हारी,
जग मिथ्या,केवल जनम-मरण की एक निशानी,
माटी का तन, हर पल लिखे, एक नयी कहानी ||
.......
aah,sach to yahi hai,bahut saral dhang se jeevan ka darshan diya

संत शर्मा said...

जग मिथ्या,केवल जनम-मरण की एक निशानी,
माटी का तन, हर पल लिखे, एक नयी कहानी ||

Bahut khubsurat, bahut sahi