Saturday, August 9, 2008

एक ही बाती एक दीप की....

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सूनी - सूनी पगडण्डी,पर निरख ना पथ का सूनापन,
गति पाँवों को देना दिनकर की,अथक सतत अपनापन,
मंजिल दूर ना होगी पग से,स्वेद - कण बरसाना मन,
श्रम-जल से सिंचित राहों पर,अनवरत आगे बढना मन।

चुभें लाख शूल पग में या,रोक रहे हों रस्ता विषधर,
पाहन से पथरीले पथ पर,पाँव बढाना साहस रखकर,
चाहे कितनी हो बाधाएं, रोक नहीं पाएंगी रे मन !
एक बार तुम पी लेना,परिश्रम की प्याली को छककर।

पीने से बार - बार व्याकुल मन, रोक नहीं पायेंगे,
अवनि- अम्बर झुक जायेंगे, जब भी पाँव बढायेंगे,
एक मुसाफिर एक राह,राहें ना बदल कर चलना मन !
एक ही बाती एक दीप की,भोर भये तक जल जायेंगे।

दर्प - दीप जलने ना देना, भय - ग्रस्त करेगा राहें,
होंगी दूभर फिर सहनी , विद्वेष की अनचाही बाहें,
अनजाने पथ का पथिक अरे ,डगर भूल ना जाना मन !
शाम ढले सूरज चल देता, तुझको भी चलना है मन ।

नित-नूतन विश्वासों के संग, बनना टूटे बल का सम्बल,
कीर्तिमान की विजय-पताका, फहराना उत्तुंग-शिखर पर,
धूप - छाँव में जीवन की,अविकल कदम बढाना रे मन !
अपने मन की हरी दूब से, जग भी हरा बनाना मन ।|

गीता पंडित (शमा)

5 comments:

श्रद्धा जैन said...

चुभें लाख शूल पग में या,रोक रहे हों रस्ता विषधर,
पाहन से पथरीले पथ पर,पाँव बढाना साहस रखकर,
चाहे कितनी हो बाधाएं, रोक नहीं पाएंगी रे मन !
एक बार तुम पी लेना,परिश्रम की प्याली को छककर।

पीने से बार - बार व्याकुल मन, रोक नहीं पायेंगे,
अवनि- अम्बर झुक जायेंगे, जब भी पाँव बढायेंगे,
एक मुसाफिर एक राह,राहें ना बदल कर चलना मन !
एक ही बाती एक दीप की,भोर भये तक जल जायेंगे।


bhaut bhaut sunder bhaav aur geet aisa ki gunguna hi uthe

Akshaya-mann said...

ये रचना बहुत ही प्रेरणादायक है और बहुत ही spl. है जिसकी तारीफ करनी मेरे बसकी बात नहीं शब्द्कम पड़ जायेंगे

रश्मि प्रभा said...

main to vismay vimugdh hun.....
lag raha hai sreshth kaviyon ki pankti me aa baithi hun......

विक्रांत बेशर्मा said...

पीने से बार - बार व्याकुल मन, रोक नहीं पायेंगे,
अवनि- अम्बर झुक जायेंगे, जब भी पाँव बढायेंगे,
एक मुसाफिर एक राह,राहें ना बदल कर चलना मन !
एक ही बाती एक दीप की,भोर भये तक जल जायेंगे।


बहुत ही अच्छी कविता है !!!!!

praveen pandit said...

धूप - छाँव में जीवन की,अविकल कदम बढाना रे मन !
अपने मन की हरी दूब से, जग भी हरा बनाना मन ।।

उत्साही है रचना, यह तो एक सच है ही,शुष्क मन को सींचती भी है।
अंतिम पंक्ति साक्षी है इस सत्य की।