Thursday, August 7, 2008

पी का संदेसा नहीं लाएं....

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मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये |


उमड़-घुमड़ घनघोर - घटाएँ,
जब भी नील-गगन में छायें
बिजली की ले दीप्त ध्वजाएं,
दिग - दिगांतर में फहराएँ,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये |


यूँ सारा सुनसान - सदन ये,
पर घन की आवाज सघन ये,
नित बादल घिर मुझे डराएं,
पी का संदेसा नहीं लाएं ,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये |


प्रथम दामिनी बाहर चमके,
दूसरी अंतर्मन में दमके,
जलती बुझतीं अभिलाषाएं,
दिप-दिपा उडगन सी जायें,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये |


गीता पंडित (शमा

2 comments:

रश्मि प्रभा said...

ab kya kahun.....
मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये |.......
mahadevi ji samne aa gai,
badhaai itni sundar kavita sunane ke liye

Rita said...

aisa lagta hai...kahin mere man ki vyatha hai..