Monday, October 22, 2012

दो मुक्तक ..... गीता पंडित

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 कभी रूठकर सो जाती है 
 
कभी टूटकर खो जाती है 

कैसी है ये मन की मैना

फिर भी सपने बो जाती है .
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किसने अलख जगाया जोगी

द्वार रैन के उजियारी है

पात-सुमन से बातें करती 

भोर लगी कितनी प्यारी है .
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 गीता पंडित 

1 comment:

राकेश कौशिक said...

"कैसी है ये मन की मैना
फिर भी सपने बो जाती है"
लाजवाब - आभार