Monday, March 11, 2013

स्त्री देह नहीं मन है ...... गीता पंडित



अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस पर __


धन्य हुई स्त्री आज एक दिन तो कम से कम उसे सम्मानित किया गया | एक दिन की 
साम्राज्ञी बनाया गया | उसके लियें जय - जयकार के नारे लगाए गये जिसने उम्रभर 
संस्कारों को जिया | घूँट - घूँट समर्पण को पिया | बंद कमरे, बंद तहखानों में बिन 
हवा धूप रोशनी के स्वयं को भुलाकर तुम्हें केवल तुम्हें स्मरण किया | आहा !!!! तालियाँ
बजानी चाहियें उसे आज वो कृतग्य हुई |

यही हुआ हमेशा कभी लक्ष्मी, कभी देवी दुर्गा पूजनीया बनाकर अस्तित्व ही छीन लिया | 
उसमैं स्त्री कब रही उसे याद नहीं | केवल भोग्या, दासी, इंसान कब समझा गया ? हर 
काल में, हर हाल में समर्पिता होकर भी समर्पण को तरसती रही, घुट्ती रही | क्या कहूँ
 बहुत क्षोभ है, बहुत पीड़ा है आक्रोश है, फिर भी प्रेम है तुमसे |

स्त्री यानी आधी आबादी, पराये तो पराये अपनों से ही त्रस्त, अपनों से ही खौफज़दा | 
ओह!!!!! अपनों पर भी विश्वास न कर पाये तो कहाँ जाये, किससे कहे, कैसे सहे, कैसे 
निबटे ? घर या बाहर हर जगह असुरक्षित |

लेकिन कितना भी तोड़ो, नोचो खसोटो, आघात करो उन अंगों पर जहाँ से तुम्हें जन्म 
मिला है वो न टूटेगी न, न अंधेरों को अपना साथी बनाएगी |

वो देह नहीं मन है, विचार है | निडर हो जियेगी | वो सृष्टा है, निर्मात्री है सृष्टि की | 
फिर से निर्माण करेगी एक नयी सृष्टि का, जहाँ वह स्त्री होने का सुख भोग सके, और 
गर्व कर सके अपने जननी होने पर | आमीन !!!!!!
                                                  
                                                                                                                     


गीता पंडित
8 फरवरी 2013   

 http://fargudiya.blogspot.in/2013/03/blog-post_12.html                                                     


Tuesday, January 1, 2013

;You Go Girl' तस्लीमा नसरीन की कविता का अनुवाद .... गीता पंडित



अनुवाद
_______


तुम जाओ लड़की ____

उन्होंने कहा ___  स्वीकारो इसे सहजता से  
कहा ___ शांत रहो 
कहा ___ बंद करो बातें करना 
कहा ___ चुप रहो 
वे बोले __बैठो नीचे 
कहा ___ झुकाओ अपना सर 
कहा____ जारी रखो चीखना ;  बहने दो आँसू 

क्या करना चाहिए तुम्हें जवाब में ?

तुम्हें खड़े हो जाना चाहिए अब 
खड़े होना चाहिए तुरंत 
करके अपनी  पीठ सीधी 
करके अपना सर ऊंचा 
तुम्हें बोलना चाहिए 
बोलो अपने दिमाग से 
बोलो इसे तेज आवाज़ में 
चीखो !


तुम्हें चीखना चाहिए इतनी जोर से कि वे दौड पड़ें बचने के लियें 
वे कहेंगे तुम बेशर्म हो 
जब तुम सुनो कि ,बस हँसो

वे कहेंगे __ तुम हो चरित्रहीन 
जब तुम सुनो कि __ बस हँसो जीर से 

वे कहेंगे __ 'तुम हो सड़ी हुई "
तो बस हँसो , हँसो और जोर से ..

सुनकर तुम्हें , वे चीखकर कहेंगे  
"तुम हो वैश्या "

जब वे कहते है कि 
बस रख लो अपने हाथ अपने कूल्हों पर 
खड़ी हो जाओ दृढता से और कहो 
'हाँ, हाँ, मैं हूँ एक वैश्या"

वे हो जायेंगे हैरान (अचंभित) 
वे घूरेंगे अविश्वास में 
वे करेंगे इंतज़ार तुम्हारे कहने का , और अधिक .

पुरुष उनमें से पड़ जायेंगे लाल और बहायेंगे पसीना 
स्त्रियाँ उनमें से देखेंगी स्वप्न होने का वैश्या तुम्हारे जैसी  || 


अनुवादक 
गीता पंडित 
2  जनवरी  2013 



...
.......


You Go Girl !
..............................
They said—take it easy…
Said—calm down…
Said—stop talkin'…
Said—shut up….
They said—sit down….
Said—bow your head…
Said—keep on cryin', let the tears roll…

What should you do in response?

You should stand up now
Should stand right up
Hold your back straight
Hold your head high…
You should speak
Speak your mind
Speak it loudly
Scream!

You should scream so loud that they must run for cover.
They will say—'You are shameless!'
When you hear that, just laugh…

They will say— 'You have a loose character!'
When you hear that, just laugh louder…

They will say—'You are rotten!'
So just laugh, laugh even louder…

Hearing you laugh, they will shout,
'You are a whore!'

When they say that,
just put your hands on your hips,
stand firm and say,
'Yes, yes, I am a whore!'

They will be shocked.
They will stare in disbelief.
They will wait for you to say more, much more…

The men amongst them will turn red and sweat.
The women amongst them will dream to be a whore like you.

Tuesday, December 18, 2012

बचना मेरी राह में आने से...... गीता पंडित

.....
........ 



मैंने कभी नहीं ललकारा 
तुम्हारे पुरुषत्व को

तुमने ललकारा मेरे स्त्रीत्व को
एक बार नहीं, दो बार नहीं 
जाने कितनी बार 
बरसों सदियों 


मेरा प्रेम समर्पित था 
तुम्हारे लियें
तुम्हारी इच्छाओं के लियें
तुम्हारे सुख-सौंदर्य-वैभव के लियें

कहाँ रास आया तुम्हें
देवी बनाकर मुझे 
बना दिया बंधक

भूल गये मेरा मन, 
मेरी चेतनता, मेरा प्रेम , मेरा समर्पण
यहाँ तक कि मेरा अस्तित्व
बन गयी अहिल्या
सीता, मांडवी उर्मिला रुक्मणी सी 
राह देखती रही तुम्हारी

हाय रे भाग्य ! रह गयी केबल देह मात्र
एक जीवित लाश


मैं भी पगली ! मौन तुम्हारे प्रेम में
नहीं पहचान पायी तुम्हारी छलना को
आज भी नहीं पहचानती
अगर तुमने नहीं कुचला होता 
मेरी आत्मा को
मेरे अंतस को


बस अब और नहीं
मैं लडूंगी स्वयं से, 
तुमसे,
इस समूचे समाज से, 
संसार से
  

हाँ याद रहे
बचना मेरी राह में आने से |



गीता पंडित 
19 दिसंबर 2012 


( 12 दिसंबर 1012 को दिल्ली में घटी बलात्कार की अमानवीय घटना पर )

Monday, October 22, 2012

दो मुक्तक ..... गीता पंडित

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 कभी रूठकर सो जाती है 
 
कभी टूटकर खो जाती है 

कैसी है ये मन की मैना

फिर भी सपने बो जाती है .
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किसने अलख जगाया जोगी

द्वार रैन के उजियारी है

पात-सुमन से बातें करती 

भोर लगी कितनी प्यारी है .
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 गीता पंडित 

Thursday, October 4, 2012

इतने ऊंचे उड़े गगन में ...... गीता पंडित (एक नवगीत )


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इतने ऊंचे उड़े गगन में
पंख कटे सिसकायें
मन की खूंटी
टंगे हुए हैं 
किसको ये दिखलायें


धमनी-धमनी बिखर गये हम 
नस-नस में विष फैले
प्रीत मांगती
भिक्षा डोले
मीरा से मन दहले
    
सात-समंदर पार बस गये
बँगला पैसा गाड़ी
घर की ड्योढ़ी
रस्ता देखे
कटी हुई हैं नाड़ी

बिना पलस्तर दीवारों में
मन कैसे
हुलसायें


लैपटॉप में सिमट रह गया
जन-मानस का प्यार  
सूनी अँखियाँ
बेवा जैसे
भूल चलीं त्यौहार

हास खो गया मान खो गया
राख हुई नैतिकता
चिंगारी हर      
पल सुलगाये
कहाँ गई मौलिकता

किसको देखें किसे दिखाएँ
खुद मन को
बहलायें 


वृद्धाश्रम खुल गये कि देखो
अपने हुए बिराने
बूढ़ी अँखियाँ
खोज रही हैं
किसको अपना माने

ये कैसी ऊंचाई जिसने
मन-तन को है बाँटा
ममता बिलख
रही है मन में
अंतर पर है चाँटा

प्रेम बिना निस्सार है जीवन 
किसको ये 
सिखलाएँ


गीता पंडित 
दिल्ली 


5 / 9 / 2012


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Saturday, September 1, 2012

सूर्य की किरणों तले हर घर बसा दूँ तो चलूँ....गीता पंडित

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सूर्य की  किरणों  तले 
एक घर बसा दूँ तो चलूँ
आज धीरज फिर से मैं मन को बंधा दूँ तो चलूँ


ये बहारें  भी  हरा कब 
कर सकी है इस धरा को 
मन की सूखी-ठूँठ पर किसलय उगा दूँ तो चलूँ


जा रहे हो  तुमको  मैं
आवाज़  दे सकती नहीं
फिर भी चुपके से तुम्हें अपना बना दूँ  तो चलूँ


जलते  हैं  दीपक सभी
रात ये  मिट्ती  कहाँ है
भोर की हर  इक सुबहा पथ में बिछा दूँ तो चलूँ


है अधर ख़ामोश ‘गीता’
नयन बेकल पथ निहारें
आज थोड़ा सा मैं फिर से मुस्करा  दूँ तो चलूँ 
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गीता पंडित

1 सितम्बर 12.

Wednesday, August 29, 2012

क्यूंकि मैं एक स्त्री हूँ ....... गीता पंडित

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सूर्य की तपती हुई

आँखों में आँखें डालकर

मैं अडिग अब भी खड़ी हूँ 


वो अलग है भाप बनकर के जली हूँ

समय की वेणी बनाकर

गूंथ ली है भाल में

हाँ सुरभी से बेशक लड़ी हूँ


हर असत की पीठ पर कोड़े लगाकर पल पलक में

किरकिरी बनकर पड़ी हूँ

हाँ अभी मैं अन-लिखी हूँ , अन-पढ़ी हूँ


फिर भी देती हूँ अमावस को चमक में 

और पूनम की सदा बन पूनमी बनकर झड़ी हूँ


क्यूंकि मैं एक स्त्री हूँ ...

इसलियें मैं जी रही हूँ 



गीता पंडित

३० अगस्त १२ 

Sunday, August 26, 2012

एक मुक्तक .... गीता पंडित

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नई राहें बनाई हैं कभी जब पथ रुके पथ में 

न जाने क्यूँ अभी तक सामने मंजिल नहीं पाई 

घिरे घनघोर हैं बादल अँधेरे में घिरे पनघट

फिर भी आस की चूनर कभी मन ने ना ढलकाई



गीता पंडित 

26 गस्त 12





Tuesday, August 14, 2012

रक्त पिपासक समय हो रहा ... गीता पंडित ( पन्द्रह अगस्त की पूर्व संध्या पर ) सभी भारतवासियों को शुभ कामनाएँ ( देश विदेश )


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रक्त पिपासक समय हो रहा 
अब क्यूँ मूक बने डोलो

प्राचीरों में दबी घुटी सी
सोई किसकी सिसकी है
तहखानों में बंद राज सी
देखो किसकी हिचकी है

बच्चा –बच्चा बने सिपाही
गद्दारों को हो फांसी
जो भी देश के दुष्मन हैं
वो सारे हों वनवासी

जात - पात भाषा के झगड़े 
अब तो मन-तन पर तोलो

पैंसठ वर्ष हो गये अब क्यूँ
नहीं दिखा भाईचारा
कौन नहीं है बोलो माँ के
लियें चमकता इक तारा

बंदी हुई भावना क्यूँकर
स्वार्थ हुआ सब पर भारी
राजतंत्र के सम्मुख घुटने
टेक रही अब लाचारी

बनकर के ललकार चलो तुम 
मुंह अपना अब तो खोलो
........


गीता पंडित 
15 अगस्त 12 



Tuesday, July 31, 2012

अनुराग है अस्तित्व मेरा (स्त्री) ...... गीता पंडित

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प्रेम मेरा वसन है
आत्मा है राग
अनुराग है अस्तित्व मेरा
गाती रहूंगी जीवनपर्यंत

तोडती रहें परिस्थितियाँ
नहीं डिगा पाएंगी पथ से
आयरन खाकर हो गयी हूँ आयरन
चेरी हूँ विरह की

लिखती है मेरी लेखनी व्यथा
जो टपकती है तुम्हारी पलकों से
मेरी आँख में
व्यथा जो करती है नर्तन
धुरी पर प्रेम की

प्रेम जो अनश्वर है
अनादि है
हो गया है ओझल 
हमारी आँख से 
या 
हो गये हैं गांधारी हम ही 
......


गीता पंडित 

1 अगस्त / 12 

Wednesday, July 25, 2012

हक़दार हैं भई पुरस्कार के (एक व्यंग्य) .... गीता पंडित

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मनाया जायेगा जश्न
टकराएंगे जाम से जाम
माँ उतारेगी आरती अपने सपूतों की
बहन लेगी बलाएँ
और करेगी प्रार्थना भाईयों की लंबी उम्र के लिये
उन के द्वारा किये गये कारनामों के लियें
रोशन करके आये हैं जो पिता का नाम,
गली मौहल्ले, समाज देश का नाम


कारनामा भी इतना बड़ा
जिसे सुनकर सिहर उठेगी हवा
सहम जायेगी बहती सरिता
दहल जाएगा धरती का दिल-ओ दिमाग


रेप किया चौहत्तर वर्ष की महिला का
बलात्कार किया ढाई साल की मासूम बच्ची का
मारा पीटा, नोचा खसोटा
निर्वस्त्र किया सडक पर जाती अकेली लड़की को


लंबी है कारनामों की फेहरिस्त
इनाम तो मिलना ही चाहिए
दे दीजिये आप जो चाहें 
हक़दार हैं भई पुरस्कार के 



गीता पंडित 
25/7/12

Sunday, June 3, 2012

एक नवगीत ... झुलसे नन्दन वन ... गीता पंडित



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झुलसे नन्दन – वन ____



हाहाकार मचा है भीतर  
अधरों पर है सूखापन
ऊपर टंगी
हुई है आँखें
अम्बर लाये रूखापन  

तपते सूरज ने झुलसाया
गात सुनहरा तक्त हुआ
अम्बुआ की डाली का झूला
मौन हुआ अभिशप्त हुआ
तकुवे सी
चुभती महंगाई
गर्मी लाई सीने में
छुन-छुन करता
गर्म तवे सा
मनवा हुआ पसीने में

सबसे जाकर
बतियाते हैं
चल ले आयें नन्दन-वन

आपाधापी के इस युग में
चैन कहाँ आराम कहाँ
साध बड़ी है महानगर की
छोटी नगरी काम कहाँ
सालों साल
बिताते तन्हा
करें प्रतिक्षा दम साधे
गर्मी तन-मन  
को झुलसाए
पीर जिया को है बाँधे

ओ रे बदरा !
सुन लो अब तो
चल ले आयें अमृत घन


गीता पंडित


साभार 

Tuesday, May 8, 2012

एक मुक्तक .... खो गये हैं पथ .... गीता पंडित



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खो  गये  हैं  पथ  वो  सारे  जो  बने  मेरे लियें थे

आज बढ़ते  पाँव मेरे जाने किस मंजिल की और

वो सुबह भी आयेगी जब हर किरण नर्तन करेगी

मन के सावन में मचल उठेगी फिर से वो ही भोर .



.... गीता पंडित

Friday, March 16, 2012

"मौन पलों का स्पंदन " गीता पंडित के नवगीत संग्रह पर .... सईद अयूब..

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मीर की एक 
गज़ल थी कोई 
या मीरा मन 
की गाथा,
जाने कहाँ भटक
कर खो गई
वो मेरे मन
की राधा. (गीता पंडित)

आजकल गीता पंडित के गीतों/नवगीतों के संग्रह “मौन पलों का स्पंदन” से पुनः गुज़र रहा हूँ और जैसे-जैसे इस संग्रह से गुज़रता जाता हूँ, कशिश और बढ़ती जाती है. न जाने क्यों (हो सकता है ऐसा सिर्फ़ मुझे लगता हो) गीतों और नवगीतों के प्रति समकालीन हिंदी कविता का रुख उपेक्षा भरा है जबकि गीत हमारे समाज, जीवन और कविता के अभिन्न अंग रहे हैं, हैं, और रहेंगे भी. मुझे लगता है कि यह उपेक्षा जानबूझ कर अपनाई गयी है. गीत लिखना, छंदों का उचित व्यवहार करना, स्वर का ध्यान रखना, तुक बैठाना आदि-आदि एक छंदमुक्त (या छन्द से मुक्त) कविता लिखने की अपेक्षा कहीं अधिक कठिन है. मैं यह नहीं कह रहा कि छंदमुक्त कविता लिखना बहुत आसान है किंतु उसकी तुलना में गीत लिखना अधिक कठिन है. और संभवतः, इसी कठिनता के कारण गीत-लेखन को उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है जबकि गीत अपनी बहुत सहज संप्रेषणीयता के कारण, छंदमुक्त कविता कि तुलना में लोगों के दिलोदिमाग और ज़बान तक बहुत आसानी से पहुँच जाते हैं. गीतों को याद रखना और उन्हें गुनगुनाना जितना आसान है, उसकी रचना उतनी ही मुश्किल. 



गीता पंडित जैसे लोग यदि गीतों की साधना में लगे हुए हैं तो आवश्यकता है कि हम उन्हें याद करें, उनके काम को भी महत्व और सम्मान दें और उनको और उनके गीतों को भी कविता पर होने वाली बहसों में शामिल करें. 
गीता जी का एक नवगीत आप सबकी नज़र करता हूँ...

शब्द गीले
हो ना जायें
इसलिए मैं मौन हूँ,
मौन में भी कह सकूँगी.

है ह्रदय वट
पर लिखा
प्रीत का जो
पृष्ठ पहला,
गूँजता है कोर
पर आ
नयन की कैसा
अकेला,

बंद मन की
सीप में
मोती बनी मैं रह सकूँगी.

शब्दों का दे
आवरण अब
प्रीत को
आकार दूँगी,
मन की गागर
में भरी हर
भावना को
वार दूँगी,

झूमते लय ताल
सुर को
रागी मन में सह सकूँगी
......



मौन में भी कह सकूँगी..
---‘प्रीत का जो पृष्ठ पहला’
पुस्तक- मौन पलों का स्पंदन (गीत-नवगीत संग्रह), गीतकार- गीता पंडित, प्रकाशक- काव्य प्रकाशन, हापुड़

Tuesday, March 6, 2012

पड़ी रंगों की बौछारें ....... गीता पंडित

...
.....



पड़ीं रंगों की बौछारें सब सखियाँ डोल गयीं
लाज के सारे पहरे देखो 
पल में खोल गयीं |

भर पिचकारी 
मार रहे हैं सखा सभी मिल जुलकर
काले नीले पीले चहरे रंग हाथ में भर कर
लगा रहे इक दूजे पर सब हँसी ठिठोली करके
आँखों में पतवार नेह की
नौका पर चढ़ चढ़कर

पाँव थिरकने लगे कि झांझर 
संग में बोल गयीं |

कैसा ये 
मौसम है जिसमें झर गये पीले-पात
होली का उत्सव है लाया नेह रंगीले प्रात
रंग भरे सपने हैं आये रंग भरी मनुहारें
झूम रहे हैं सब नर नारी
हो गये ढीले गात
    
याद पिया की आकर नयनों 
को अनमोल गयीं ||



 गीता पंडित 


साभार  http://www.anubhuti-hindi.org/ से 
  

सभी को होली के विशेष उत्सव पर रंगभरी अशेष शुभ कामनाएँ और बधाई .... गीता ..