Saturday, September 27, 2008

मन - मंथन....

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बेकल मन की बेकल बातें, मन में ही रह जाती हैं,
सुर गीतों को दे ना पातीं, मन ही मन पछताती हैं,
क्या भूलें क्या याद करें नित,मन-मंथन गहरा करके,
नयनों के काजल को, धीमे से गीला कर जाती हैं।


चंचल और वाचाल आँख,चुपचाप सभी कुछ सहती है
टिक जाती है एक बिंदु पर, टिकी वहीँ बस रहती है,
विवेक भूलकर नीर-क्षीर का,कहाँ - कहाँ खोई रहती,
बेसुध मन से आकर आशा, ना जाने क्या कहती है।


नभ को आँखों में भरकर, नित नयी ऊर्जा पाती है,
मौन अधर पर नेह की वंशी जाने क्या लिख जाती है
टूटे पल-पल जोड़-जोड़कर मन फिर से बुनता सपने,
हाथ लगा माटी को एक, आकार नया दे जाती हैं ।


घटित चाहे कुछ भी हो जाये, जीवन चलता जाता है,
लेख अमिट हैं जन्म-मृत्यु के, कोई बदल ना पाता है,
मन जो कुसुमित होता है तो,आता हर पल गा गा कर,
या फिर बन दिनकर दहके, साँझ ढले पिघला जाता है।।

गीता पंडित (शमा)

Thursday, August 28, 2008

छोटी कविताएँ....

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कौन से थे वो बिंदु जिसमें,
उलझ कर मन रह गया,
एक पिपासित चातक बनकर,
शब्दो मे क्यूँ बह गया,

शब्द - अर्थ में खोकर अंतर,
अब कैसा पगलाया सा,
जाने क्या कहना चाहे,
ना जाने क्या अर्थ कह गया||
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शब्दों के जब अर्थ व्यर्थ हों,
और मौन हो जायें अनसुने,
पल पल में पल की ही काया,
अपने में हो जाये शत-गुने,


सम्मुख आने वाले पथ जब
पथ को पथ में ही खो दें,
धीरे से फिर व्यथा वेदना
अश्रू अंतर्मन में बो दे


गीता पंडित (शमा)

Saturday, August 9, 2008

एक ही बाती एक दीप की....

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सूनी - सूनी पगडण्डी,पर निरख ना पथ का सूनापन,
गति पाँवों को देना दिनकर की,अथक सतत अपनापन,
मंजिल दूर ना होगी पग से,स्वेद - कण बरसाना मन,
श्रम-जल से सिंचित राहों पर,अनवरत आगे बढना मन।

चुभें लाख शूल पग में या,रोक रहे हों रस्ता विषधर,
पाहन से पथरीले पथ पर,पाँव बढाना साहस रखकर,
चाहे कितनी हो बाधाएं, रोक नहीं पाएंगी रे मन !
एक बार तुम पी लेना,परिश्रम की प्याली को छककर।

पीने से बार - बार व्याकुल मन, रोक नहीं पायेंगे,
अवनि- अम्बर झुक जायेंगे, जब भी पाँव बढायेंगे,
एक मुसाफिर एक राह,राहें ना बदल कर चलना मन !
एक ही बाती एक दीप की,भोर भये तक जल जायेंगे।

दर्प - दीप जलने ना देना, भय - ग्रस्त करेगा राहें,
होंगी दूभर फिर सहनी , विद्वेष की अनचाही बाहें,
अनजाने पथ का पथिक अरे ,डगर भूल ना जाना मन !
शाम ढले सूरज चल देता, तुझको भी चलना है मन ।

नित-नूतन विश्वासों के संग, बनना टूटे बल का सम्बल,
कीर्तिमान की विजय-पताका, फहराना उत्तुंग-शिखर पर,
धूप - छाँव में जीवन की,अविकल कदम बढाना रे मन !
अपने मन की हरी दूब से, जग भी हरा बनाना मन ।|

गीता पंडित (शमा)

Friday, August 8, 2008

हाय ! रह ना पाती....

मिल जाये,अंधकार को,कितनी भी आजादी,
बुझ पायेगी ना, अंतर्मन जो जलाये बाती,
डिगें ना प्रण से, कहतीं वेद - रिचाएं सारी,
ले देख देव-लोक भी,आज हिय की आचारी,


धारे देखो, निस्वार्थ - भाव से, नदी बहाती,
तरु - वर की सौगातें, नित ही हमें लुभातीं,
सूरज की थाती बिना मोल, कैसे बिक जाती,
थक जाने पर, लोरी गाने क्यूँ रजनी आती,


बदलती ॠतुएँ , गुण जीने के सिखला जातीं,
आस का बिगुल बजाकर भोर किरण मदमाती,
ओढ अम्बर की चादर, झूम कर बदली गाती,
अवनि भी बूंदों संग, ताल से ताल मिलाती,


योगी-यति,मुनि,ग्यान-वान साधक और ध्यानी,
पाते अंतर में उस को, जो है सबका मानी...,
मोह - पिपासा में खो जाती ,अंतर की वाणी.,
आसक्ति करती नर्तन,मन - उपवन में अभिमानी,


हाय ! रह ना पाती, मन की सुंदरता न्यारी,
पग-पग पर वो,अपनी ही मृग-तृष्णा से हारी,
जग मिथ्या,केवल जनम-मरण की एक निशानी,
माटी का तन, हर पल लिखे, एक नयी कहानी ||


गीता पंडित (शमा)

Thursday, August 7, 2008

पी का संदेसा नहीं लाएं....

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मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये |


उमड़-घुमड़ घनघोर - घटाएँ,
जब भी नील-गगन में छायें
बिजली की ले दीप्त ध्वजाएं,
दिग - दिगांतर में फहराएँ,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया, अभी ना आये |


यूँ सारा सुनसान - सदन ये,
पर घन की आवाज सघन ये,
नित बादल घिर मुझे डराएं,
पी का संदेसा नहीं लाएं ,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये |


प्रथम दामिनी बाहर चमके,
दूसरी अंतर्मन में दमके,
जलती बुझतीं अभिलाषाएं,
दिप-दिपा उडगन सी जायें,

मन मेरा आली ! डर जाये,
मेरे पिया अभी ना आये |


गीता पंडित (शमा

Tuesday, August 5, 2008

हर सुबह लेकर जो आये ....

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हर सुबह लेकर जो आये भोर की पहली किरण,
जाग उठें फिर से मन के,खोये हुए सारे सपन,
आस्था और नेह की, बाती जले, जलती रहे,
और थोड़ी सी महक ,दे जाये बासंती - पवन,


धूप को आना है आये, तुम उसे ना रोकना,
छाँव बनकर विटप की मन, अपने ऊपर ओढना,
हाँ थकाने आयेंगे पल अंक में भर-भर हिमालय,
स्वेद-कण मोती की मानिंद,हौले - हौले पोँछना,


ऐसे सौरभ की घड़ी, फिर से ना आये क्या पता,
आज है जो गीत-सरिता, कल भी होगी क्या पता,
बाँध लो मन इन पलों को,आज शब्दों के वसन में,
और उतारो गीत में फिर, प्रीत की आकाश - गंगा ||


गीता पंडित (शमा)

माँ ...

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तुम क्या नहीं हो..माँ

आँख हो मेरी
देखती हूं जिससे
मैं ब्रहमाण्ड,

मेरी धमनियों में
बहता रक्त हो जो
देता है मुझे जीवन,

हो हड्डी,माँस-मज्जा.
जो देती है मुझे ताकत
पाँवों पर अपने
खडे होने की,

तुम दिमाग हो
जो कराता है अहसास
मुझे सही गलत का,

तुम हो ईश्वर,
क्योंकि तुम हो कारण सृष्टि का
निमित्त हो उत्पत्ति का,

तुम माँ हो...माँ
तुम्हें शत - शत - नमन ॥

गीता पंडित (शमा
)

Tuesday, July 29, 2008

याद ......

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शायद याद किया है उसने, एक बड़े अरसे के बाद.,
देखो हिचकी मुझको आये , एक बड़े अरसे के बाद.|

घर-आँगन सूना-सूना, सब कुछ बिखरा-बिखरा सा,
मुड़ कर देखा है फ़िर उसने, एक बड़े अरसे के बाद |

एकाकी मरुथल सी साँसे, प्यासी रेतीली धरती...,
तुम तो सावन लेकर आये, एक बडे अरसे के बाद |

मीरा सी दीवानी हूँ मैं, सुध-बुध जग की भूल गयी,
तुम दीवाने बन कर आये, एक बड़े अरसे के बाद.|

घुप्प अँधेरी रात घनी है, सन्नाटों की चहल-पहल..
तुम तो शायद पूनम लाये, एक बड़े अरसे के बाद.|

दरवाजे खिडकी बंद सभी, हवा-धूप सब है खामोश.,
"शमा" को जीवन देने आये,एक बड़े अरसे के बाद |

गीता पंडित (शमा)

Thursday, July 5, 2007

यादों की घन - घोर घटाएं...

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उमङ-घुमङ कर नभ-अन्तर में,
यादों की घन - घोर घटाएं.,
कौंध-कौंध बिजली सी आयें.,
भिगो-भिगो मन को सरसायें,
कभी हँसाएं, कभी रुलाएं..,
जीवन में रस बरसा जायें..,

जब तुम थे तब जान ना पायी,
अब जाना जब हुई परायी..,.,
बीते पलों का नेह-नीर भर..,,
सुधि गागर छल छलकी जाती,
याद तुम्हारी बरबस आकर..,,
मन में एक तरिणी बन जाती,

प्रीत पगी सी पहली लोरी...,
कब तुमने कानों में भर दी..,
अपने अंतस से गुन-गुन कर,
कब शब्दों की प्राची वर दी..,
छंद-बद्ध कर संस्कारों की..,
कब सुंदर सी कविता रच दी,

अन-जाने अंवगुँठित नेह की.,
इंद्र-धनुषी साङी लपेट दी...,
पंख देकर सुंदर पाखी के...,
नभ की मुझे कमान सौँप दी.
पर जीवन की धूँप-छाँव में.,
याद तुम्हारी,निर्झर झरती..,

अन-कहे, अचीन्हे शब्दों के..,
सार आज आते से दिखते..,
काल-ग्रही जो हो गये सपने.,
फिर रंगोली के रंग में सजते,
तुम्हारे आशीर्वचन देखो तो..,
लेखनी से कविता में ढलते..,

मरुथल में भी बरखा लाये..,
भिगो-भिगो मन को सरसायें,
कभी हँसाएं, कभी रुलाएं..,
जीवन में रस बरसा जायें..,

गीता पण्डित

बहार की पहली फुहार.....


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नव-किसलय जब मुसका कर,
तरूवर की काया पर डोलें..,
शिशु का कोमल स्पर्श परस,
नभ को तरूवर भी छू लें..,

कली-फूल सिर हिला-हिला..,
हँस-हँसकर जब पास बुलाएं.,
उमड-घुमड-कर बादल भी..,
धरती से प्रेम-आलाप करे..,

कोयल डाली पर अम्बुवा की ,
जब मीठे सुर में गुंजार करे..
हुलस-हुलस कर मनवा भी ,
मन का सोलह-श्रंगार करे..,

तब बहार की पहली फुहार..,
ले आये तुम्हारी सुधियों को ,
रजनी-गंधा सी महक-महक,
सुरभित करती तन-मन को,

तब चुपके से प्रीत कुंवारी..,
मोती बन पलकों पर सजती,
टीस हृदय में उठती गहरी..,
अन्तर्मन में जाकर रिसती..,

गीता पण्डित

Monday, June 4, 2007

आरज़ू ....

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नहीं जानती मैं ,
जानना भी नहीं चाहती
नहीं समझती मैं ,
समझना भी नहीं चाहती,

रहने दो बंद सभी
खिङकी-दरवाजे,
छुपा रहने दो यूँ ही,
बिना रोशनदान के,
दरो-दीवारों में,

जानती हूं मैं ,
भटक रही है आत्मा,
आरज़ू की यहीँ-कहीँ,
ढूंढ रही है मुझे,
फिर से अपने चंगुल में,
दबोचने के लियें,

लेकिन अब मैं,
तैय्यार नहीं.

गीता (शमा)

Sunday, June 3, 2007

कोई मीत नहीं..,

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कोई मीत नहीं..,
कोई गीत नहीं..,

एक उम्र रो गई.,
चुप-चाप सो गई,

कांधा कोई नहीं..,
कोई कफ़न नहीं.,

दो गज ज़मीं नहीं,
आँसू की लङी नहीं,

जन्मों से मुक्त हुई,
"ओम" में लुप्त हुई,

सब कुछ है वही,
बस मैं नहीं रही,

गीता (शमा)

Monday, May 7, 2007

प्रिय ! तुमको मैं क्या बतलाऊँ

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प्रिय ! तुमको मैं क्या बतलाऊँ

मन अबोध शिशु सा मेरा,
हठ बार-बार मुझसे करता,
बैठ अकेला एक कौने में,
चाह तुमहारी पल-पल करता,
प्रिये उसको कैसे समझाऊँ..?
प्रिय तुमको मैं क्या बतलाऊँ.?

मन वीणा के तार हैं टूटे,
भाव सभी हैं रूठे-रूठे..,
गीत मैं कैसे बनाऊँ ? ?
सुर भी हैं सब छूटे-छूटे..,
प्रिये! कैसे तुमको मैं गाऊँ ?
प्रिय तुमको मैं क्या बतलाऊँ ?

शब्द सभी अर्थ-हीन हो गये,
भाब सभी व्यर्थ खो गये.,
कैसे सोचूँ ? क्या सोचूँ मैं ?
तमस गहम गहराता जाये..,
प्रिये! उनको मैं कैसे खोजूँ,?
प्रिय! तुमको मैं क्या बतलाऊँ ?

तपन प्रीत की सूखी माटी,
कीकर-काँटे,चुभन ही सारी,
भीतर है अब पीडा भारी.,
सूखी नेह-सरिता भी सारी.,
प्रिये! कैसे इसको सरसाऊँ ?

प्रिय! तुमको मैं क्या बतलाऊँ ?
प्रिये! कैसे तुमको मैं गाऊँ ? ? ?

गीता (शमा)

सूर्योदय...

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निशा को कर विदा हँसकर...,
रश्मि रथ पर निकला दिनकर.,
स्वर्णिम आभा सुन्दर अम्बर..,
कर्णा-भिराम विहग कलरव...,

पल्लव पर मोती ओस के कण,
मन को मोहते सुगन्धित सुमन,
भीनी-भीनी बासन्ती बयार...,
कान्धे पर गोरी के जल गागर.,

भारी बस्ते, बोझिल बचपन..,
अन्गडाई लेता चन्चल यौवन..,
माथे पर सिन्दूरी टीका.....,,
प्यारा आन्गन, प्यारा साजन..

आचमन करता कोई तन.....,
पूजा मेँ मग्न कोई मन......,
तुलसी को देता कोई जल ....,
मन्दिर की घन्ट ध्वनि घन-घन.

शमा (गीता)

मंजिल....

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तुमने ये सब क्या कहा.
मुझसे सुना जाता नहीं,
आँख मैं आते हैं आँसू,
कुछ नजर आता नहीं.

तेरे सजदे मैं पङी हैं..,
आरज़ू मेरी सभी.....
जिनको एक-एक कर चुना था,
तेरे लियें मैने कभी.........

अब तो मुझसे आईना भी
हो गया है अजनबी.....
पूँछता है मुझसे वो.......,
तू कहाँ पर खो गई,........

आज भी मेरी समझ मैं
बात ये आई नहीं.........
क्या ?और कैसी थी मैं,
आज क्या मैं हो गई.......

कह-कशों की भीङ थी.,
सपनों की बारिश थी कभी,
आज फ़िर ये हाल क्यूँ.....,
नीँद भी आती नहीं........

ए - शमा - तू ही बता...,
मंजिल कहाँ पर है मेरी.....
ढूँढती है रूह भी.....,
बरसों से है सोई कहीँ.......

शमा (गीता)